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जगन्नाथ जी की आरती

 जगन्नाथ जी की आरती



जय जगन्नाथ, जय जगन्नाथ,

स्वामी जय जगन्नाथ।

भक्तों के संकट हरते,

स्वामी जय जगन्नाथ।


नीलाचल नाथ तुम्हारे,

दर्शन सुखदाई।

अंग-कमल मधुकर जैसा,

मन को लुभाई।

जय जगन्नाथ, जय जगन्नाथ,

स्वामी जय जगन्नाथ।


सुदर्शन चक्र सजाया,

कर में कृपान।

दीन-दुखियों के नाथ,

किया कल्याण।

जय जगन्नाथ, जय जगन्नाथ,

स्वामी जय जगन्नाथ।


रथ पर चढ़कर आते,

सब दुख दूर करते।

चरणों की रज से सबके,

पाप नष्ट करते।

जय जगन्नाथ, जय जगन्नाथ,

स्वामी जय जगन्नाथ।


प्रेम से जो भी गाए,

आरती तेरी।

उस पर कृपा बरसाओ,

हे जग के स्वामी।

जय जगन्नाथ,

 जय जगन्नाथ,

स्वामी जय जगन्नाथ।


दूसरी आरती 



जगन्नाथ जी की आरती (दूसरी)



जय जगन्नाथ हरे, स्वामी जय जगन्नाथ हरे।

भव भय हरण, वंदन करन,

जय जय जगन्नाथ हरे।


नीलाचल में तेरा वास,

तुम हो सबके आस।

दीन दुखी के कष्ट मिटाते,

तुम हो दया के सागर।

जय जगन्नाथ हरे, स्वामी जय जगन्नाथ हरे।


सुभद्रा संग विराजे तुम,

बलभद्र तुम्हारे संग।

सुदर्शन चक्र शरण में,

हर लेते सबके दोष।

जय जगन्नाथ हरे, स्वामी जय जगन्नाथ हरे।


भक्तों के हो प्राण आधार,

दुख हरो सबके नर-नार।

रथ यात्रा में दर्शन देकर,

सबका उद्धार करते।

जय जगन्नाथ हरे, स्वामी जय जगन्नाथ हरे।


जो कोई मन से ध्यान लगावे,

द्वार तुम्हारे आए।

उस पर कृपा की वर्षा कर,

संसार पार लगावे।

जय जगन्नाथ हरे, स्वामी जय जगन्नाथ हरे।



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